कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, इसलिए जानें 'नो कॉस्ट ईएमआई का असली कॉस्ट


नई दिल्ली। त्योहारी मौसम के शुरू होते ही कई ऑनलाइन और ऑफलाइन रिटेलर्स मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि पर 'नो कॉस्ट ईएमआई या 'जीरो कॉस्ट ईएमआई ऑफर कर रहे हैं। इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट्स (समान मासिक किस्त) यानी ईएमआई के कारण खरीदारी के वक्त एकमुश्त बड़ी रकम भुगतान करने से राहत मिल जाती है, लेकिन किसी को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि इस नो कॉस्ट ईएमआई की सचमुच कोई कीमत नहीं चुकानी होती है। इसलिए, यह जानना जरूरी है कि नो कॉस्ट ईएमआई की असली कीमत क्या होती है। 
माइलोनकेयर के फाउंडर गौरव गुप्ता ने कहा, 'ज्यादातर ऑफलाइन और ऑनलाइन रिटेलर्स कन्ज्यूमर ड्युरेबल लोन के लिए खास वित्तीय संस्थानों से समझौता करते हैं, ताकि वे उन ग्राहकों को भी इलेक्ट्रॉनिक अप्लायंसेज, गैजेट्स आदि बेच सकें जो पूरे पैसे देकर खरीदारी नहीं कर सकते। हालांकि, ऐसे लोन को नो कॉस्ट ईएमआई के रूप प्रचारित किया जाता है, लेकिन वास्तव में इस पर 16 से 24 प्रतिशत तक की ऊंची ब्याज दर लागू होती है।

कानून क्या कहता है?
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने वर्ष 2013 के एक सर्कुलेशन में कहा है कि कोई भी लोन ब्याज मुक्त नहीं है। 17 सितंबर 2013 का सर्कुलर कहता है, 'क्रेडिट कार्ड आउटस्टैंडिंग्स पर जीरो पर्सेंट ईएमआई स्कीम में ब्याज की रकम की वसूली अक्सर प्रोसेसिंग फी के रूप में कर ली जाती है। उसी तरह, कुछ बैंक लोन का ब्याज प्रॉडक्ट से वसूल रहे हैं। चूंकि जीरो पर्सेंट इंट्रेस्ट का कोई चलन ही नहीं है, ऐसे में पारदर्शी तरीका यह है कि प्रोसेसिंग चार्ज और ब्याज को प्रॉडक्ट/सेगमेंट के अनुकूल रखे जाएं, न कि लोने देनेवाले अलग-अलग संस्थानों के मर्जी के मुताबिक। नो कॉस्ट ईएमआई जैसी स्कीम का इस्तेमाल सिर्फ ग्राहकों को लुभाने और उनका शोषण करने के लिए किया जाता है।

कैसे काम करती है नो कॉस्ट ईएमआई स्कीम?
जैसा कि आरबीआई के सर्कुलर में कहा गया है, जीरो पर्सेंट स्कीम और कुछ नहीं, बल्कि एक मार्केटिंग फंडा है और लोन का ब्याज किसी-न-किसी रूप में ग्राहकों से ही वसूला जाता है। गुप्ता ने इसके दो तरीकों के बारे में बताया। इनमें एक यह तरीका है जिसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लैटफॉर्म अक्सर अपनाते हैं कि फुल पेमेंट करने पर आपको जो छूट मिलती, उसे नहीं देते और छूट की वही रकम बैंक या उस संस्थान को देते हैं, जिनसे वह कन्ज्यूमर ड्युरेबल लोन के लिए समझौता करते हैं। उनका दूसरा तरीका यह है कि वे लोन पर ब्याज की रकम भी प्रॉडक्ट में ही जोड़ देते हैं। देखिए ये स्कीम कैसे काम करते हैं।

जब ब्याज के बराबर छूट मिल रही हो
अक्सर ई-कॉमर्स प्लैटफॉर्म यही तरीका अपनाते हैं। वे ब्याज की रकम के बराबर डिस्काउंट ऑफर करते हैं। मान लीजिए, आप जो फोन खरीदना चाहते हैं, उसकी कीमत 15 हजार रुपये है। तीन महीने की ईएमआई प्लान में 15त्न की दर से ब्याज वसूला जाता है। इस तरह आपको 2,250 रुपये का ब्याज देना होता है। आप फोन की जो कीमत अदा करते हैं, उसे दो भागों में बांटा जाता है। एक हिस्सा रिटेलर के पास जबकि दूसरा हिस्सा ब्याज के रूप में बैंक या अन्य वित्तीय संस्थान के पास जाता है। अब अगर आपने पूरे पैसे देकर फोन खरीदें तो आपको 12,750 रुपये ही देने होंगे। इस तरह, अगर आपने तीन महीने की ईएमआई पर फोन लिया तो 2,250 रुपये की छूट हटाकर और ब्याज की रकम जोड़कर आपको हर महीने 5 हजार रुपये देने होंगे।