सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिहार में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण सही, अदालत ने कहा- 'यह संविधान और कानून की कसौटी पर खरा



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि निर्वाचन आयोग द्वारा कराया जा रहा 'एसआईआर' पूरी तरह संवैधानिक है और यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के नियमों के दायरे में आता है। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने दिया। अदालत को इस मामले में यह तय करना था कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत वर्तमान स्वरूप में एसआईआर कराने का कानूनी अधिकार है या नहीं।


प्रक्रिया के आधार पर पूरे एसआईआर को गलत नहीं ठहराया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ने इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एसआईआर के जरिए चुनाव आयोग लोगों की नागरिकता तय करने का प्रयास कर रहा है।

मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत हैं। यदि चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है, तो महज प्रक्रियागत सवालों के आधार पर पूरे पुनरीक्षण कार्य को अवैधानिक या गलत नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने माना कि बिहार में निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के लिए एसआईआर के तहत उठाए गए कदम पूरी तरह जरूरत के मुताबिक थे।

मतदाताओं पर नहीं है खुद को साबित करने का बोझ

अदालत ने उन दलीलों को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं पर खुद को सही साबित करने का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान को छोड़कर कहीं और रहने लगा है, तब भी वह प्रक्रिया से बाहर नहीं होता, क्योंकि उसका या उसके परिवार का नाम पुराने रिकॉर्ड में मौजूद रहता है।


सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के रुख का समर्थन करते हुए कहा:


  • आयोग ने दस्तावेजों की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता के आधार पर ही लोगों को सूची में शामिल किया है, जिसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।
  • एसआईआर का उद्देश्य किसी भी वैध नागरिक को मतदाता सूची से बाहर करना कतई नहीं है।
  • यदि कोई दस्तावेज फर्जी या गलत पाया जाता है, तो आयोग नाम जोडऩे से इनकार कर सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आयोग नागरिकता तय कर रहा है।

चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता, लेकिन संदिग्ध मामले केंद्र को भेजे

फैसले का निष्कर्ष पढ़ते हुए पीठ ने कहा कि यह विस्तृत कार्य पूरी तरह संविधान सम्मत है और निर्वाचन आयोग को इसके नियम व प्रक्रिया तय करने का पूरा अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि चुनाव आयोग खुद नागरिकता तय नहीं करता, लेकिन वह संदिग्ध नागरिकों के मामलों को केंद्र सरकार को रेफर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश:चुनाव आयोग जिन लोगों की नागरिकता पर संदेह जताता है, उनकी जानकारी 4 सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण को सौंपे। इसके बाद सक्षम प्राधिकरण अगले चुनाव की शुरुआत होने से पहले तक इन मामलों पर अपना अंतिम निर्णय ले।

इन प्रमुख संगठनों और नेताओं ने दायर की थी याचिका

बिहार में चल रही इस प्रक्रिया के खिलाफ 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्सÓ , पीयूसीएल  समेत कई नागरिक संगठनों और देश के प्रमुख विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। याचिकाकर्ताओं में राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा, सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता के. सी. वेणुगोपाल, सांसद पप्पू यादव और राजद सांसद सुधाकर सिंह सहित कई अन्य नाम शामिल थे, जिनकी याचिकाओं को निपटाते हुए कोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला दिया है।

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