मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

लॉक डाउन ने फूल उत्पादक किसानों को पहुंचाया भारी आर्थिक नुकसान

नई दिल्ली। लॉक डाउन के कारण फूल उत्पादक किसानों को इस बार न केवल भारी आर्थिक नुकसान हुआ है बल्कि ऋण के कारण कुछ लोग अवसाद का सामना भी कर रहे हैं। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से फूलों को खेती करने वाले छोटे किसान जबरदस्त आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं । कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण अचानक लॉक डाउन की घोषणा से इन किसानों के फूल के बाग उजड़ गए हैं। किराए पर लिए गए खेत की राशि का भुगतान , बैंक से लिए गए ऋण , अगली फसल के लिए पूंजी की व्यवस्था और कई अन्य समस्याएं इनकी नींद उड़ाए हुए हैं । अधिकांश किसानों ने जीवन में पहली बार इस प्रकार की स्थिति का सामना किया है जिसके कारण उन्हें कोई नया रास्ता नहीं दिख रहा है। हरियाणा के सोनीपत जिले के अकबरपुर बरोटा गांव के बड़ी संख्या में किसान पुश्तों से फूलों की खेती करते आए हैं लेकिन इस बार उनकी पूंजी पूरी तरह से डूब गई है । फूलों की खेती को बीमा की सुविधा का प्रावधान नहीं होने से इनकी क्षति की भरपाई का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। इस क्षेत्र के किसान गेंदा , जाफरी , गुलदाउदी , गुलाब , मार्किट तथा कई अन्य प्रकार के फूलों की खेती करते है और राष्ट्रीय राजधानी के गाजीपुर , खारी बावली और नांगलोई फूल मंडी में फूल बेचते है । अक्टूबर से मई माह के दौरान फूलों का यह सीजन होता है और इसके बाद नई फसल उगाते हैं । अकबरपुर बारोटा में करीब 500 एकड़ में किसान फूलों की खेती करते हैं। इस गांव के युवा किसान संजय कुमार ने बताया कि इस बार लॉक डाउन की घोषणा के साथ ही यातायात के साधनों के बंद होने के साथ ही मंदिर , मंडी , शादी और कार्यालय बंद हो गए तथा होटल का कारोबार मंदा हो गया जिससे फूलों की आपूर्ति बंद हो गई । गत माह 23 से 31 तक ग्रीष्मकालीन नवरात्र था जिसमें किसानों को फूलों का बेहतर मूल्य मिलता है , जिसके दौरान उदासी छाई रही । संजय ने लगभग 20 एकड़ में फूलों की खेती की थी लेकिन अब उसे उजाडऩा चाहते हैं लेकिन उसके लिए उन्हें मजदूर नहीं मिल रहा है। इसी गांव के किसान कृष्ण ने किराए पर जमीन लेकर करीब 20 एकड़ में फूलों कि खेती की थी उन्हें लगभग 20 लाख रुपए का नुकसान हो गया है । उन्होंने बताया कि 37-38हजार रूपए सालाना की दर से ठेके पर जमीन लेकर फूलों कि खेती की थी । किराए की जमीन होने के कारण संस्थागत संस्थानों ने उन्हें ऋण नहीं दिया था । कृष्ण पिछले तीन साल से फूलों कि खेती से जुड़े हैं ।
सोनीपत जिले के हलालपुर गांव के अशोक दहिया ने बताया कि वह पौली हाउस में गुलाब की खेती के अलावा गेंदा , जाफरी और कुछ अन्य फूलों की खेती करते हैं । उन्होंने एक एकड़ से कुछ कम जमीन में पोली हाउस में गुलाब की तथा आधा एकड़ में अन्य फूलों की खेती की थी । इस बार फूलों के बर्बाद हो जाने से उन्हें करीब तीन लाख रुपए का नुकसान हुआ है । उन्होंने बताया कि पांच साल के लिए पोली हाउस का निर्माण किया जाता है जिस पर बड़ी रकम खर्च की जाती है । एक एकड़ में 14 हजार गुलाब के पौधे लगते हैं और एक गुलाब का पौधा 28 रुपए में लगाया गया था । उन्होंने बताया कि उनके पास इंगलिश गुलाब है जिसकी पत्तियों का कोई उपयोग नहीं कर पा रहे हैं और न ही उनके पास कोई प्रसंस्करण इकाई है जिसमें वह कोई मूल्य वर्धित उत्पाद बना सकते हैं।
सोनीपत के ही सुरेन्द्र कुमार ने बताया कि 20 एकड़ में फूलों की खेती के बर्बाद होने पर उन्होंने 10 एकड़ में ककड़ी की फसल लगा दी है जो 15 दिन के बाद फलने लगेगा । सुरेन्द्र ने खेती और गोदाम बनाने के लिए 15 लाख रुपए का ऋण ले रखा है जिसके भुगतान की समस्या है । वर्ष 2014 में फौज से सेवानिवृत होने के बाद फूलों की खेती में जुटे धरू फौजी ने बताया कि दो एकड़ में फूलों की खेती की थी लेकिन नुकसान के बाद डेढ़ एकड़ को जोत दिया है । उनके ऊपर बैंक का छह लाख रुपए का ऋण है जिससे वह परेशान है । अधिकतर किसानों ने कहा कि आर्थिक संकट के कारण वे मानसिक रूप से परेशान हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ अधिकारियों और कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने भी माना है कि फूल उत्पादक किसानों को भारी नुकसान हुआ है । इन फूल उत्पादक किसानों का कोई संगठन नहीं है लेकिन उनका मानना है कि जब टैक्सी चालकों , निर्माण मजदूरों और अन्य लोगों को सरकार राहत दे सकती है तो फूलों की खेती में लगी पूंजी बर्बाद हुई है जिसका उन्हें मुआवजा मिलना ही चाहिए । राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015..16 में देश में 249 हजार हेक्टेयर में फूलों की खेती की गई थी और इसमें 1659 हजार टन लूज फूल और 484 हजार टन कट फूल का उत्पादन हुआ था । वर्ष 2018..19 में 571.38 करोड़ रुपए के फूलों का निर्यात किया गया था । तमिलनाडु , कर्नाटक , पश्चिम बंगाल तथा कई अन्य राज्यों में फूलों की व्यावसायिक खेती की जाती है ।

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