सोमवार, 13 जनवरी 2020

सबरीमला: महिलाओं के धार्मिक अधिकारों पर सुनवाई तीन हफ्ते टली

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने सोमवार को स्पष्ट किया कि वह केवल सबरीमला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर ही नहीं, बल्कि मुस्लिम और पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकारों पर भी विचार-विमर्श करेगी।
मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि वह उन्हीं मुद्दों पर सुनवाई तय करेगी, जो 14 नवम्बर 2019 को पांच सदस्यों की पीठ ने उसे सुपुर्द किया था। इनमें महिलाओं का मंदिर और मस्जिद, पारसी महिलाओं का अगियारी में प्रवेश और दाउदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना जैसे मसले शामिल हैं। अलग-अलग धर्मों में धार्मिक रीति-रिवाजों पर महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव के मामले में अदालत दखल दे सकती है या नहीं, इस पर भी विचार-विमर्श किया जायेगा। मामले में अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा," हम नहीं चाहते कि इस मामले की सुनवाई में अधिक समय खराब हो, इसलिए मामले में टाइम लाइन तय करना चाहते हैं। सभी वकील आपस में तय करके बताएं कि जिरह और दलीलों में कितना समय लगेगा।"
न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा कि इस मामले पर आगे की सुनवाई किन सवालों पर होगी, कौन वकील किस मुद्दे पर बहस करेगा, इसके लिए न्यायालय के महासचिव 17 जनवरी को सभी वकीलों से मीटिंग करके एक समय सीमा तय करेंगे। बैठक में तय होगा कि किस मुद्दे पर कौन वकील दलील देगा।
संविधान पीठ में न्यायमूर्ति आर भानुमति, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति एम. एम. शांतनगौडर, न्यायमूर्ति एस. ए. नजीर, न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी, न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत शामिल हैं।
गौरतलब है कि 28 सितंबर, 2018 को एक संवैधानिक पीठ ने 10 से 50 साल के आयुवर्ग की महिलाओं को सबरीमाला स्थित भगवान अयप्पा मंदिर में प्रवेश न देने को असंवैधानिक करार देते हुए सभी उम्र की महिलाओं के लिए मंदिर के दरवाजे खोल दिए थे। इसके बाद 60 पुनर्विचार याचिकाएं इस फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थीं, जिन्हें गत 14 नवम्बर को वृहद पीठ को सौंप दिया गया था। 

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