राम मंदिर में चढ़ावा चोरी: 'नहीं दिखाई गई इस्तीफे की कॉपी'



- अब चंपत राय के रिजाइन को लेकर नया विवाद, उठे सवाल

लखनऊ (ए.)। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले में ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि चंपत राय के इस्तीफे की कॉपी नहीं दिखाई गई है। महंत दिनेंद्र दास ने आरोप लगाया कि चंपत राय का इस्तीफा ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने लिया और पूरे घटनाक्रम में उनकी ही प्रमुख भूमिका रही। 

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में महासचिव चंपत राय के इस्तीफे को लेकर नया विवाद सामने आ गया है। ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास ने दावा किया है कि वह चंपत राय का इस्तीफा नहीं लेना चाहते थे। उन्होंने कहा कि केवल वही नहीं, बल्कि ट्रस्ट के अधिकतर सदस्य भी चंपत राय का इस्तीफा स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे।

महंत दिनेंद्र दास ने आरोप लगाया कि चंपत राय का इस्तीफा ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने लिया और पूरे घटनाक्रम में उनकी ही प्रमुख भूमिका रही। उन्होंने कहा कि बैठक में चंपत राय की ओर से सौंपे गए इस्तीफे की प्रति भी सार्वजनिक नहीं की गई, जिससे पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

उन्होंने बताया कि बैठक में ऑनलाइन जुड़े सदस्य के परासरण ने ट्रस्ट डीड का हवाला देते हुए कहा कि चंपत राय की ओर से इस्तीफा दिए जाने के बाद वह स्वत: प्रभावी माना जाएगा। इसी आधार पर इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। हालांकि, महंत दिनेंद्र दास का कहना है कि ट्रस्ट डीड में इस्तीफे की जो प्रक्रिया और नियम निर्धारित हैं, उनका इस मामले में पालन नहीं किया गया।

एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि जब ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी हैं तो इस पूरे मामले में उनकी भी जिम्मेदारी बनती है। उनका कहना था कि इस्तीफे की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए थी और ट्रस्ट के सभी सदस्यों को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए थी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वह नहीं जानते कि किस दबाव में इस्तीफा लिया गया। चढ़ावा चोरी विवाद के बीच आए इस बयान से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भीतर मतभेद और गहराते दिखाई दे रहे हैं। अब चोरी की जांच के साथ-साथ चंपत राय के इस्तीफे की प्रक्रिया भी नए विवाद का विषय बन गई है।

उधर, रामनगरी के संतों ने चंपत राय को निर्दोष बताते हुए उनके नैतिक आधार पर दिए गए इस्तीफे का स्वागत किया, लेकिन मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए वरिष्ठ संतों की भागीदारी वाली एक स्वतंत्र निगरानी समिति गठित करने की मांग की। उनका कहना है कि संत समाज की सक्रिय भागीदारी से भविष्य में इस प्रकार के विवादों की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।


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