-आदिवासी और वैष्णव संस्कृति का अनूठा संगम; देश का इकलौता मंदिर जहां रथयात्रा में शामिल होते हैं भगवान के 22 विग्रह
अनिल सामंत/नरेंद्र पाणीग्राही
जगदलपुर । बस्तर का ऐतिहासिक 'गोंचा महापर्व' केवल भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा नहीं, बल्कि छह शताब्दियों से अधिक समय से चली आ रही अटूट आस्था और लोक-संस्कृति का विराट उत्सव है। वर्ष 1408 ईस्वी में काकतीय (चालुक्य) वंशीय शासक महाराजा पुरुषोत्तम देव द्वारा प्रारंभ की गई यह गौरवशाली परंपरा आज लगभग 618 वर्षों बाद भी उसी भव्यता, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ जीवंत है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होने वाला यह पर्व बस्तर की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
राजा को मिली थी 'रथपति' की उपाधि, ऐसे पड़ा 'गोंचा' नाम
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, महाराजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथपुरी की रथयात्रा में शामिल हुए थे। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर पुरी के गजपति महाराज ने उन्हें 'रथपति' की उपाधि दी थी और 16 पहियों वाला विशाल रथ भेंट किया था। बस्तर लौटने के बाद उन्होंने जगदलपुर में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथयात्रा प्रारंभ की। समय के साथ पुरी के 'गुंडिचा' उत्सव का स्थानीय आदिवासी उच्चारण बदलकर 'गोंचा' हो गया। महाराजा के साथ ओडिशा से आए 360 आरण्यक ब्राह्मण परिवारों की पीढिय़ां आज भी जगदलपुर के जगन्नाथ मंदिर में इन धार्मिक परंपराओं का निर्वहन पूरी निष्ठा से कर रही हैं।
बांस की 'तुपकी' और 'पेंग' फल की अनूठी सलामी
गोंचा महापर्व की सबसे विशिष्ट और अनूठी पहचान 'तुपकी' है। बांस से बनाई जाने वाली इस पारंपरिक बंदूकनुमा तुपकी में जंगली फल 'पेंग' को गोली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। बस्तर के आदिवासी और श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के रथ के सामने तुपकी चलाकर उन्हें सलामी देते हैं और आपस में पेंग चलाकर खुशियां बांटते हैं। यह अद्भुत लोक-परंपरा पूरे भारत में केवल बस्तर में ही देखने को मिलती है।
देश में अद्वितीय: एक साथ निकलते हैं 22 विग्रह
जगदलपुर के जगन्नाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के कुल 22 विग्रह (प्रतिमाएं) स्थापित हैं। रथयात्रा के दौरान इन सभी 22 प्रतिमाओं की एक साथ भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जो देश के अन्य किसी भी जगन्नाथ मंदिर में नहीं होता। आषाढ़ शुक्ल दशमी को 'बाहुड़ा गोंचा' (भगवान की वापसी यात्रा) के बाद 'कपाट फेड़ा' विधान संपन्न होगा, जिसमें माता लक्ष्मी के रूठने और भगवान के मनुहार के बाद मंदिर के द्वार खोले जाएंगे। इसके बाद देवशयनी एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ हो जाएगा।
618 वर्षों से अक्षुण्ण है आस्था का रथ
ऐतिहासिक शुरुआत: वर्ष 1408 ईस्वी में बस्तर के काकतीय वंशीय राजा महाराजा पुरुषोत्तम देव ने इस महापर्व की नींव रखी थी, जो आज 618 वर्षों बाद भी पूरी भव्यता से जारी है।
360 परिवारों की परंपरा: राजा के साथ ओडिशा से आए 360 आरण्यक ब्राह्मण परिवारों की पीढिय़ां आज भी जगदलपुर के जगन्नाथ मंदिर में इन अद्वितीय धार्मिक विधानों का निर्वहन कर रही हैं।
22 विग्रहों की महायात्रा: देश का इकलौता ऐसा जगन्नाथ मंदिर, जहां रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के सभी 22 विग्रह (प्रतिमाएं) एक साथ रथों पर विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं।
बाहुड़ा और कपाट फेड़ा: आषाढ़ शुक्ल दशमी को भगवान की वापसी यात्रा (बाहुड़ा गोंचा) होगी। इसके बाद रूठी माता लक्ष्मी को मनाने की रोचक रस्म 'कपाट फेड़ाÓ के साथ मंदिर के पट खोले जाएंगे।