नई दिल्ली। नई दिल्ली में अखिल भारतीय सम्मेलन के उद्घाटन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि नैतिकता के बिना आर्थिक और तकनीकी विकास समाज में असंतुलन पैदा कर सकता है। इस अवसर पर उन्होंने ब्रह्म कुमारी के राष्ट्रव्यापी अभियान ‘सशक्त भारत के लिए कर्मयोग’ की शुरुआत की और गुरुग्राम स्थित ओम शांति रिट्रीट सेंटर के रजत जयंती समारोह का भी शुभारंभ किया।
भौतिक प्रगति के साथ नैतिक मूल्यों का समेकन जरूरी
राष्ट्रपति मुर्मु ने अपने संबोधन में कहा कि संतुलित और समग्र विकास के लिए भौतिक प्रगति के साथ नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिकता का समावेश आवश्यक है। आर्थिक प्रगति जहां समृद्धि को बढ़ावा देती है, वहीं तकनीकी प्रगति नवाचार, दक्षता और प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करती है। उन्होंने कहा कि ये दोनों मिलकर एक समृद्ध राष्ट्र की नींव रखते हैं, लेकिन नैतिकता के अभाव में यही विकास असंतुलन का कारण बन सकता है।
अनैतिक विकास से बढ़ता है असमानता का खतरा
द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि अनैतिक आर्थिक प्रगति धन और संसाधनों के केंद्रीकरण, पर्यावरण को नुकसान और कमजोर वर्गों के शोषण का कारण बन सकती है। उन्होंने चेताया कि नैतिक मूल्यों के बिना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल मानवता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
आध्यात्मिकता देती है कर्मयोग की प्रेरणा
राष्ट्रपति ने कहा कि आध्यात्मिकता हमें आधारभूत मूल्य और नैतिक ढांचा प्रदान करती है, जो कर्मयोग यानी निस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि सत्यनिष्ठा, करुणा, अहिंसा और दूसरों की सेवा जैसे सद्गुण शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण समाज निर्माण के लिए आवश्यक हैं। जब विचार आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होते हैं, तो व्यक्ति स्वार्थ से ऊपर उठकर सर्वकल्याण की भावना से कार्य करता है।
निष्पक्ष प्रशासन का आधार बन सकती है आध्यात्मिकता
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि यदि देश का नेतृत्व आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित हो, तो प्रशासनिक निर्णय न्यायपूर्ण और निष्पक्ष होंगे। ऐसे निर्णय किसी एक वर्ग के हित में नहीं, बल्कि सभी के कल्याण के लिए होते हैं। इससे समाज में विश्वास और स्थिरता को बल मिलता है।
