श्री विजयपुरम। हिंद महासागर के विस्तृत नीले विस्तार के मध्य स्थित अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह विश्व की जैव-विविधता के मानचित्र पर एक विशिष्ट और संवेदनशील धरोहर के रूप में स्थापित हो रहा है। यहाँ की प्राणी संपदा, उच्च स्थानिकता (एंडेमिज़्म) और अनूठे पारितंत्रों ने वैज्ञानिकों एवं नीति-निर्माताओं का ध्यान समान रूप से आकर्षित किया है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (Zoological Survey of India) के अंडमान एवं निकोबार क्षेत्रीय केंद्र ने छत्तीसगढ़ से आए पत्रकारों के साथ संवाद में महत्वपूर्ण तथ्य साझा किए।
संवाद के दौरान डॉ. सिवापेरूमन, अतिरिक्त निदेशक, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने संस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अनुसंधान उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की औपचारिक स्थापना 1 जुलाई 1960 को हुई। इसकी वैज्ञानिक जड़ें 1784 में स्थापित एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल से जुड़ी हैं, जबकि आगे चलकर इंडियन म्यूज़ियम, कोलकाता में विकसित शोध परंपरा ने इसे सुदृढ़ आधार प्रदान किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र राष्ट्रीय प्राणी सर्वेक्षण संस्था की परिकल्पना प्रख्यात प्राणी विज्ञानी थॉमस नेल्सन एननडेल ने की थी।
21 अप्रैल 1977 को स्थापित अंडमान एवं निकोबार क्षेत्रीय केंद्र अगले वर्ष अपनी स्वर्ण जयंती मनाने जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, द्वीपसमूह से अब तक 11,000 से अधिक प्राणी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें लगभग 10 प्रतिशत स्थानिक हैं—अर्थात् ये प्रजातियाँ विश्व में केवल यहीं पाई जाती हैं। यह उच्च स्थानिकता द्वीपों के दीर्घकालिक भौगोलिक अलगाव, विशेषकर 10 डिग्री चैनल, का परिणाम मानी जाती है।
पक्षी विविधता की दृष्टि से द्वीपसमूह अत्यंत समृद्ध है। यहाँ 380 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज हैं, जिनमें लगभग 30 स्थानिक प्रजातियाँ शामिल हैं। तितलियों की दृष्टि से भी यह क्षेत्र उल्लेखनीय है—305 से अधिक प्रजातियाँ, जिनमें 176 प्रजातियाँ अथवा उप-प्रजातियाँ स्थानिक श्रेणी में आती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, द्वीपसमूह की जैव-भौगोलिक निकटता दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडो-म्यांमार क्षेत्र से होने के कारण यहाँ विशिष्ट प्रजातीय संरचना विकसित हुई है।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के लघु संग्रहालय में 1,500 से अधिक संरक्षित नमूनों का प्रदर्शन किया गया है, जो क्षेत्र की स्थलीय एवं समुद्री जैव-विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं। आगंतुकों के अनुभव को अधिक सशक्त और इंटरएक्टिव बनाने के उद्देश्य से संग्रहालय में शीघ्र ही क्यूआर कोड आधारित स्मार्ट सूचना प्रणाली लागू की जाएगी, जिसके माध्यम से पर्यटक एवं छात्र अपने मोबाइल उपकरणों पर प्रत्येक नमूने की विस्तृत जानकारी हिंदी और अंग्रेज़ी ऑडियो नैरेशन सहित प्राप्त कर सकेंगे।
संवाद में कई विशिष्ट प्रजातियों का उल्लेख भी किया गया। इनमें लेदरबैक कछुआ प्रमुख है, जो विश्व का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है और लंबी समुद्री यात्राएँ कर निकोबार तटों पर अंडे देने आता है। इसी प्रकार नारियल केकड़ा, जो पूर्णतः स्थलीय जीवन जीने वाला सबसे बड़ा केकड़ा है, अपनी असाधारण शक्ति और नारियल के पेड़ों पर चढ़ने की क्षमता के लिए जाना जाता है।
स्थानिक निकोबार मेगापोड के अनूठे प्रजनन व्यवहार—मिट्टी और पत्तियों के विशाल टीले बनाकर प्राकृतिक ऊष्मा से अंडों का ऊष्मायन—को भी रेखांकित किया गया। अधिकारियों ने इसकी आबादी को संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया।
सरीसृप विविधता में पायथन, कोबरा, वाइपर तथा समुद्री साँप शामिल हैं, जबकि समुद्री जैव-विविधता 6,000 से अधिक प्रजातियों—कोरल रीफ, रीफ फिश, सी अर्चिन, सी स्टार और मोलस्क्स—को समेटे हुए है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण द्वारा इन सभी प्रजातियों का सुव्यवस्थित डिजिटल एवं भौतिक डेटाबेस तैयार किया जाता है, जिसे नियमित रूप से अद्यतन कर मुख्यालय को प्रेषित किया जाता है।
देशव्यापी अनुसंधान नेटवर्क के विस्तार की दिशा में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने अमरावती में 17वें क्षेत्रीय केंद्र की स्थापना की योजना का भी उल्लेख किया। अधिकारियों ने कहा कि यह पहल भारत के विविध पारितंत्रों में जैव-विविधता अनुसंधान और संरक्षण प्रयासों को और सुदृढ़ करेगी।
यह संवाद स्पष्ट करता है कि अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह जैव-विविधता संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरणीय संतुलन के दृष्टिकोण से एक अमूल्य प्राकृतिक धरोहर है, जिसकी सुरक्षा और संवर्धन के लिए भारतीय प्राणी सर्वेक्षण सतत प्रयासरत है।
