नई दिल्ली। पिछले कुछ दिनों से ईरान संकट और प्रॉफि़ट लेने की वजह से परेशान स्टॉक मार्केट में गुरुवार, 2 अप्रैल को ज़बरदस्त बदलाव देखने को मिला। सुबह के ट्रेडिंग सेशन में 1,800 पॉइंट्स तक गिरा सेंसेक्स, सेशन के आखिर तक 2,000 पॉइंट्स तक रिकवर हुआ और 185 पॉइंट्स की बढ़त के साथ हरे निशान में बंद हुआ। इसे ही टेक्निकल शब्दों में 'वैल्यू बाइंग' कहते हैं। लेकिन असल में 'वैल्यू बाइंग' क्या है और एक आम इन्वेस्टर इसे कैसे पहचान सकता है?
असल में 'वैल्यू बाइंग' क्या है?
जब अच्छी कंपनियों के शेयर उनकी असल कीमत से कम कीमत पर मिलते हैं, तो बड़े इन्वेस्टर उस मौके का फ़ायदा उठाकर उन्हें खरीद लेते हैं, जिसे 'वैल्यू बाइंग' कहते हैं। दिग्गज इन्वेस्टर वॉरेन बफेट इसी फ़ॉर्मूले का इस्तेमाल करके अमीर बने हैं।
वैल्यू बाइंग पहचानने के 4 संकेत
- ज़बरदस्त रिकवरी: अगर सुबह मार्केट तेज़ी से गिरता है, लेकिन दोपहर में अचानक ठीक हो जाता है, तो यह वैल्यू बाइंग का संकेत है।
- ब्लूचिप प्रेफरेंस: अगर सिफऱ् अच्छे फंडामेंटल्स वाली कंपनियों में ही खरीदारी की जाती है, तो इसे 'वैल्यू बाइंग' कहते हैं। दूसरी ओर, रिस्की कंपनियों में खरीदारी को 'स्पेकुलेटिव बाइंग' कहते हैं।
- खरीदार कौन हैं?: जब विदेशी इन्वेस्टर बेच रहे हों, लेकिन घरेलू इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर खरीद रहे हों, तो इसे असली वैल्यू बाइंग माना जाता है।
- प्राइस मूवमेंट: जब गिरती कीमतों पर बड़े वॉल्यूम के साथ खरीदारी होती है, तो यह एक पॉजि़टिव संकेत है।
2 अप्रैल के आंकड़ों का 'पोस्टमॉर्टम
- गुरुवार के मार्केट के आंकड़ों पर एक नजऱ डालने से 'वैल्यू बाइंगÓ की तस्वीर सामने आती है।
- विदेशी इन्वेस्टर: लगभग क्रह्य 9,931 करोड़ की बड़ी बिक्री।
- घरेलू इन्वेस्टर: इसी दौरान, उन्होंने क्रह्य 7,208 करोड़ की बड़ी रकम खरीदी। इससे पता चलता है कि भारतीय निवेशकों ने दुनिया भर के डर को नजऱअंदाज़ करके सस्ते स्टॉक्स में निवेश किया है। इस रिकवरी में मुख्य रूप से ढ्ढञ्ज और बैंकिंग स्टॉक्स ने अहम भूमिका निभाई।
निवेशकों के लिए क्या फ़ायदे हैं?
- कम रिस्क: क्योंकि स्टॉक पहले ही गिर चुका है, इसलिए आगे और गिरावट की संभावना कम है।
- लंबे समय का मुनाफ़ा: अच्छी कंपनियों के शेयर डिस्काउंटेड कीमत पर खरीदने से उन्हें भविष्य में ज़्यादा रिटर्न मिलता है।
- स्थिरता: बड़ी कंपनियों के शेयर रखने से पोर्टफोलियो को स्थिरता मिलती है।
